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हज़रत मुहम्मद साहब का जीवन (biography)

Hazrat Muhammad Sahab Hindi Biography

हजरत मुहम्मद का जन्म 570 ईस्वी में मक्का में हुआ था और उनकी मृत्यु 632 ईस्वी में मदीना नामक शहर में हुई थी। वह अमीना के गर्भ से पैदा हुए अब्दुल्ला के पुत्र थे। जन्म से पहले पिता की मृत्यु और पांच वर्ष की आयु में माता की मृत्यु के परिणामस्वरूप, मुहम्मद का पालन-पोषण उनके दादा मुतलिब और चाचा अबू तालिब ने किया था। 25 साल की उम्र में उन्होंने खदीजा नाम की विधवा से शादी कर ली।

मुहम्मद के जन्म के समय अरब बहुत पिछड़े, कबायली और चरवाहे का जीवन व्यतीत कर रहे थे। इसलिए मुहम्मद ने उन कबीलों को संगठित करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया। 15 साल तक व्यवसाय में लगे रहने के बाद उन्होंने व्यवसाय छोड़ दिया और चिंतन में लीन हो गए। मक्का के पास हीरा की चोटी पर कई दिनों तक चिंतन करने के बाद, उन्हें फरिश्ता जिब्रील का संदेश मिला कि वह जा कर कुरान शरीफ के रूप में प्राप्त दिव्य संदेश का प्रचार करें। इसके बाद उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार करना शुरू किया।

उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, जिसने मक्का के पुरोहित वर्ग को उकसाया और अंत में मुहम्मद ने 622 ईस्वी में मक्का छोड़ दिया और वहां से 300 किमी की यात्रा यासरिब (मदीना) की ओर की। उनकी इस यात्रा को इस्लाम में ‘हिजरत’ कहा जाता है। इसी दिन से ‘हिजरी संवत’ का प्रारंभ माना जाता है। बाद में, 630 ई. में, मुहम्मद ने लगभग 10 हजार अनुयायियों के साथ, मक्का पर विजय प्राप्त की और वहां इस्लाम को लोकप्रिय बनाया। दो वर्ष बाद 632 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

जन्म

1) इस्लाम के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब थे, जिनका जन्म 570 ईस्वी में सऊदी अरब में मक्का नामक स्थान पर कुरैशी वंश के अब्दुल्ला नामक एक व्यापारी के यहाँ हुआ था। ऐसे अंधेरे के समय, स्वघोषित महात्मा मुहम्मद का जन्म 617 विक्रम संवत में अरब शहर बक्का (मक्का) में अब्दुलमातल्लब के पुत्र ‘आमना’ के पुत्र ‘आमना’ के गर्भ से हुआ था।

2) उनका वंश ‘हाशिम’ वंश के नाम से प्रसिद्ध था। जब वे गर्भ में थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। बच्चे के प्रति माता-पिता का असाधारण स्नेह था। मक्का के नागरिकों का यह रिवाज था कि वे अपने बच्चों को जगह-जगह घूमने वाले बद्दू लोगों की महिलाओं को खिलाने के लिए देते थे। एक बार की बात है ‘साद’ वंश की ‘हलिमा’ की एक बद्दू महिला मक्का में आई।

3) उन्हें और कोई संतान नहीं मिली थी, इसलिए जब धनहीन ‘आमना’ ने अपने बेटे को सौंपने के लिए कहा, तो उन्होंने यह समझकर स्वीकार कर लिया कि खाली हाथ छोड़ने से जो कुछ भी खो सकता है, वह अच्छा है। हलीमा एक महीने के शिशु मुहम्मद के साथ अपने डेरे के लिए निकली। इस प्रकार बालक मुहम्मद बद्दू-गृह में चार वर्ष तक बढ़ता रहा। इसके बाद वह फिर से अपनी प्यारी मां की गोद में आ गया। एक बार सती ‘आमना’ अपने मायके ‘मदीना’ को बच्चे मुहम्मद के साथ रिश्तेदारों से मिलने के लिए निकलीं।

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मौहत्रामा आमना का स्वर्गारोहण

1) मदीना से लौटने पर, ‘अवबा’ नामक स्थान पर, देवी ‘आमना’ पैतृक छाया रहित बच्चे मुहम्मद को अमृत समान मातृ स्पर्श से वंचित करके स्वर्ग में चली गईं। बहू और बेटे के अलग होने से दुखी ससुर ‘अब्दुलमतल्लब’ ने पोते को प्यार से पालने का भार उठाया, लेकिन भाग्य भी नहीं माना और मुहम्मद को 8 साल का छोड़कर वह भी चला गया काल के गालों पर। मरते समय उसने अपने बेटे को ‘अबुतालिब’ कहा और करुणामय स्वर में आदेश दिया कि माता-पिता रहित वत्स मुहम्मद को पुत्र के रूप में जान लें।

2) महात्मा मुहम्मद ने अपना बचपन ‘अबुतालिब’ के प्यार भरे वंश में बिताया, कभी जंगल में ऊंट और बकरियों को चराते थे और कभी अपने साथियों के साथ खेलते और खेलते थे। जब वह 12 साल का था और उसके चाचा व्यापार पर बाहर जाने वाले थे, तो उसने उससे अपने साथ चलने का आग्रह किया।

3) रास्ते में आने वाली कठिनाइयों को देखते हुए चाचा ने इसे स्वीकार नहीं किया। जब चाचा ऊँट को लेकर घर से निकलने लगे तो भतीजा ऊँट का पंजा पकड़ कर रोया और कहा- ”चाचा, मेरे न तो पिता हैं न माता। मुझे अकेला छोड़कर तुम कहाँ जाते हो? मुझे भी अपने साथ ले चलो।” इससे अबुतालिब का दिमाग इस कदर हिल गया कि वह मना नहीं कर सका और मुहम्मद के साथ ‘शाम’ की तरफ भी चला गया। एक दृष्टि मिली

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महात्मा मुहम्मद की शादी

1) सार्वजनिक प्रवचन है कि असाधारण रूप से प्रतिभाशाली महात्मा मुहम्मद जीवन भर पत्र-ज्ञान से रहित रहे। कई गुणों, चतुराई, ईमानदारी आदि के कारण, कुरैशी-वंश की एक समृद्ध महिला, ‘खदीजा’ ने उसे गुमाष्ट बनाया और युवा मुहम्मद को 25 वर्ष की आयु में ‘शाम’ जाने के लिए कहा।

2) इसे स्वीकार करते हुए, उन्होंने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। बहुत कुशलता से। कुछ दिनों बाद ‘खदीजा’ ने उनसे शादी करने की इच्छा जताई। हालाँकि खदीजा 40 साल की थीं, उनके दो पतियों की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनके कई गुणों के कारण महात्मा मुहम्मद ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।

3) कितने नए मुसलमान महात्मा बनने के लिए महात्मा को कृतज्ञता (एहसान) देते थे। जिस पर कहा गया है- ”धन्यवाद कि तुम मुसलमान हो गए, कहो- मुझ पर कृपा मत करो, ईश्वर की कृपा है कि उसने तुम्हें सच्चा मार्ग दिया है।

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